Friday, January 25, 2019

चाणक्य नीति के चौदहवें अध्याय में बताई गई है आपना खास काम निकलवाने की तरकीब

चाणक्य नीति में बताया गया है कि विद्वान और संतों के अलावा अन्य इंसान अपने स्वार्थ या मोह के बिना किसी का काम नहीं करता है। ऐसे में दूसरों को कोई लाभ दिए बिना अपना काम निकलवाना एक कला के समान ही है, लेकिन ये तरीका तब तक ही सही है जब तक आपके काम से किसी को नुकसान न हो। आचार्य चाणक्य ने अपने नीति ग्रंथ के चौदहवें अध्याय के दसवें श्लोक में ऐसा ही एक तरीका बताया है जिससे हम किसी भी व्यक्ति से अपना काम पूरा करवा सकते हैं।

इस श्लोक का अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति से अपना काम करवाना हो तो हमेशा मीठा बोलना चाहिए। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जो लोग दूसरों से अपना काम करवाना चाहते हैं जिससे सिर्फ उनका फायदा हो तो वे हमेशा मीठा बोलते हैं। इसके लिए आचार्य चाणक्य ने हिरण का उदाहरण भी दिया है।

जिस प्रकार जंगल में शिकारी हिरण का शिकार करने के लिए मीठी आवाज में गाने गाता है। इस गाने को सुनकर हिरण शिकारी के जाल में फंस जाता है। यही बात इंसानों पर भी लागू होती है। किसी व्यक्ति को अपने जाल में फंसाने के लिए मीठी-मीठी बातों का सहारा लिया जाता है।

इसी प्रकार किसी सांप को फंसाने के लिए सपेरा बीन बजाता है। बीन की तंरगों में फंसकर सांप सपेरे के सामने पहुंच जाता है और खुद की जान को आफत में डाल देता है। अत: इस बात का भी हमें ध्यान रखना चाहिए कि जब कोई अधिक मीठा बोले तो उसकी बातों न फंसे। वरना भविष्य में कोई भयंकर परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।

रामायण में कई तरह की ज्ञान की बातें बताई गई हैं। ये ग्रंथ केवल कथा नहीं है। इससे जीवन जीने की कला सीखनी चाहिए और साथ ही ये भी सीखना चाहिए कि आपको किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करना चाहिए। रामायण में हर रिश्ते की आदर्श स्थितियाें के बारे में भी बताया गया है। हमें रामायाण से धर्म और समझदारी के साथ जीवन जीने की शिक्षा भी मिलती है। इस तरह रामायण के प्रमुख पात्र यानी राजा दशरथ, श्रीराम, सीता, लक्ष्मण और भरत से हम जीवन की वो खास बातें सीख सकते हैं जिनको अपनाने से हर मुश्किलें आसान हो जाती हैं।

1. राजा दशरथ
राजा दशरथ ने अपनी दाढ़ी में सफेद बाल देखकर तत्काल राम को राजा बनाने की घोषणा कर दी।
क्या सीखें- हम जीवन में अपनी परिस्थिति, क्षमता और भविष्य को देखकर निर्णय लें। कई लोग अपने पद से इतने मोह में रहते हैं कि क्षमता न होने पर भी उसे छोडऩा नहीं चाहते।

2. श्रीराम
राजा बनने जा रहे श्रीराम ने वनवास भी सहर्ष स्वीकार किया।
क्या सीखें- जीवन में जो भी मिले उसे नियति का निर्णय मानकर स्वीकार कर लें। विपरित परिस्थितियों के परे उनमें अपने विकास की संभावनाएं भी तलाशें। परिस्थितियों से घबराएं नहीं।

3. सीता
सीता श्रीराम के साथ वनवास में रही, जबकि उनका जाना जरूरी नहीं था।
क्या सीखें- ये हमें सिखाता है कि किसी की परिस्थितियां बदलने से हमारी उसके प्रति निष्ठा नहीं बदलनी चाहिए। हमारी निष्ठा और प्रेम ही हमें ऊंचा पद दिलाते हैं।

4. भरत
भरत ने निष्कंटक राज्य भी स्वीकार नहीं किया, श्रीराम की चरण पादुकाएं लेकर राज्य किया।
क्या सीखें- अधिकार उसी चीज पर जमाएं, जिस पर नैतिक रूप से आपका हक हो और आप उसके योग्य हों। भरत ने खुद को हमेशा राम के अधीन समझा, इसलिए जो राजपद श्रीराम को मिलना था, उसे भरत ने स्वीकार नहीं किया।

5. लक्ष्मण
राम हमेशा भरत की प्रशंसा करते, उसे ही अपना सबसे प्रिय भाई बताते, जबकि राम के साथ सारे दु:ख लक्ष्मण ने झेले, इसके बावजूद भी लक्ष्मण ने कभी इसका विरोध नहीं किया। 
क्या सीखें- आप कोई भी काम करें तो उसे कर्तव्य भाव से करें, प्रशंसा की अपेक्षा न रखें, प्रशंसा की इच्छा हमेशा काम से विचलित करती है।

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